लेटे हुए आसमाँ को तकते रहे

लेटे हुए आसमाँ को तकते रहे हम रात भर,
न नींद आयी, न तुम आये, जगते रहे हम रात भर।

अए मेरी सरज़मीं मेरे जीने और मरने में परेशानी एक ही है,
तुझसे मोहब्बत बेशुमार और निसार करने को जवानी एक ही है।

ग़र जलना ही है तो बेहतर है कि कुंदन हो जाऐं,
गरल जितना भी है संगत में चंदन हो जाये।

जिस दौर के हम थे वो आया ही नहीं,
ज़िन्दगी से ज़्यादा बेज़ार हमने कुछ पाया ही नहीं।

दुनिया के रस्मों रिवाजों को जाने क्यों न दर कोई और मिलता है,
उन्हीं चौखटों पर तालों से पड़ जाते हैं, जहाँ कोई ख़ाब पलता है।

©प्रिंसी मिश्रा

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